यह ब्लॉग खोजें

पृष्ठ

कुल पेज दृश्य

लोकप्रिय पोस्ट

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

बस वही मेरी दीवानगी

बस वही मेरी दीवानगी का आलम है और तू है, खोया हूँ मैं सोचते कि मेरी दीवानगी तू है या तू खुद दीवानगी है। ऐ हमसफ़र तेरा दीदार है नुमायाँ हर जगह हर डगर, खोया हूँ मैं सोचते कि रास्ता तू है या तू खुद मंज़िल है। है परवाह ज़माने को मेरी और मुझे उसकी परवाह है, खोया हूँ मैं सोचते कि ज़माने में मैं हूँ या ज़माना मेरी पनाह में है। आशिक़ की आशिकी भी बयाँ क्या जुबाँ से होगी कभी, खोया हूँ मैं सोचते कि निगाहे नज़र में दिल है या बयाँ दिल खुद निगाहों से है। उफ़ ये ज़िन्दगी के शिकवे शिकायतें जैसे समंदर में कश्ती है, खोया हूँ सोचते मैं कि शिकवा ए कश्ती हूँ या समंदर खुद मेरा किनारा है। ऐ हमनशीं रूह के मालिक तेरा दीदार दे कर करम किया तूने, खोया हूँ सोचते मैं कि मिट जाऊँ तेरे सदके या तू खुद मुझमे मिट गया है। बस वही मेरी दीवानगी का आलम है और तू है, खोया हूँ मैं सोचते कि मेरी दीवानगी तू है या तू खुद दीवानगी है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें