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शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

नग्न सत्य

सत्य नग्न होता है जिसे शब्द के आवरण खुद को मिटा कर नहीं दिखा पाते और शब्द अनावृत होकर सिर्फ सत्य का आभास दे सकते हैं। जीव का जीवन शब्द रूप है जिसका भाव रूप ही सत्य है। शब्द भावों हेतु साधन है पर भाव शब्द पर आश्रित नहीं होते। जीव के परस्पर मिलन में एक आत्म से परमात्म का परम योग नहीं होता अपितु आत्म के आत्म मिलन से परमात्म बोध होता है। परमात्मा आत्मा में निहित हैं और आत्मा स्वयं परमात्मा में निहित है और यही परम योग है जिसे साधन रूपी शरीर और जगत द्वारा बोध में पाया जाता है लेकिन जीव का यह समझना की उसके परमात्मा की प्राप्ति अर्थात परम योग किसी साधन की आश्रित है या उससे उत्त्पन्न है तो यह भ्रम है सत्य नहीं। यह जीवन स्वयं परमयोग द्वारा साधी हुयी है या कहें पल पल परम योग से सृष्टी निष्पत्ति को प्राप्त कर रही है। श्रृंगार रस की अतिश्योक्ति से कान्हा मैया यशोदा के आँख हो सकते हैं और भाव हेतु उपयुक्त है किन्तु कान्हा स्वयं अपनी माँ की आँख ही हैं यह नहीं हो सकता। इसी प्रकार दो पूरक जीवन साधनो का परस्पर मिलन उस निराकार मूल आत्म ऊर्जा का बोध दे सकता है किन्तु वही मिलन परम योग हो यह भ्रान्ति है । परम योग में तो सबका आत्म अपने परमात्मा में लीन ही है और उनसे गति प्राप्त कर रहा है जिसका बोध अनेकानेक जीवन साधन और उसकी अवस्थाओं से होता और साधनाओं से प्राप्त भी होता है। उदाहरण स्वरुप एक बालक को रूपये खर्च कर ख़ुशी होती है और उसके लिए रूपये का इतना ही महत्त्व है। एक किशोर के लिए रूपये की उत्त्पत्ति और बचत में ख़ुशी होती है और उसके लिए रूपये का महत्त्व जीवन के साधन रूप में है। एक वयस्क के लिए रूपये का प्रचालन, नियमन और निवेश में ख़ुशी होती है और उसके लिए रूपये का महत्त्व संपत्ति सम्मान ऐश्वर्य के रूप में है। एक प्रौढ़ के लिए रुपया मात्र अनेकानेक साधनो का रूप मात्र है और वह मूल धन अर्थात जीवन सामर्थ्य अर्थात समय और साथ को जानता है और उसे सिर्फ मूल धन से ख़ुशी प्राप्त होती है। इसी प्रकार परमात्मा का परम योग अनंत रूप धरे सृष्टी में गतिमान है उसे साधन और उसके पारस्परिक मिलन या संबंधों का आश्रित समझना एक अज्ञान अथवा भ्रम का परिचायक है भूल है। हरी ॐ नमः शिवाय

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