जैसा तन वैसा मन , जैसा मन वैसा तन। जैसी स्त्री वैसा पुरुष , जैसा पुरुष वैसी स्त्री। जैसा आध्यात्म वैसा जीवन, जैसा जीवन वैसा आध्यात्म। जैसा आत्मा वैसा परमात्मा , जैसा परमात्मा वैसी आत्मा। जैसा राग वैसा वैराग्य, जैसा वैराग्य वैसा राग। जैसा भव वैसा भाव, जैसा भाव वैसा भव। जैसी वृत्ति वैसी प्रवित्ति, जैसी प्रवित्ति वैसी वृत्ति। जैसी लक्ष्य वैसी दिशा , जैसी दिशा वैसा लक्ष्य। यही यम मार्ग है , यही राम उपस्तिथि है। स्त्री में पुरुषत्वआत्म में है अर्थात उसमे परमात्मा उसके अंतर में पुरुष बन बसता है। पुरुष में स्त्रीत्व आत्म है अर्थात उसमे परमात्मा उसके अंतर में स्त्री बन बसता है। स्त्री के आत्म में स्थित पुरुषत्व हेतु उसका शरीर स्त्रीत्व रखता है और पुरुष के आत्म में स्थित स्त्रीत्व हेतु उसका शरीर पुरुषत्व रखता है। तत्व रूप में परमात्मा आत्मा से अलग नहीं और नहीं शरीर और आत्मा अलग हैं। जब एक शरीर, जीव अर्थात यम मार्ग में चलता है अर्थात भव में बंधता है तब आत्मा में परमात्मा अर्थात मुक्तता अर्थात भाव स्थित हो जाता है । जब आत्मा अर्थात जीव यम मार्ग में चलता है अर्थात भाव में बंधता है तब शरीर अर्थात परमात्मा मुक्तता अर्थात भव में स्थिर हो जाता है। परमात्मा शरीर और आत्मा अर्थात स्त्री और पुरुष दोनों रूपों में है या कहें तो उनका एकत्व है या कहें तो परमात्मा अर्थात उस एक ब्रम्ह स्वरुप का द्विज रूप या माया रूप ही शरीर और आत्मा या स्त्री और पुरुष रूप में मौजूद रहता है और अपने द्विज रूप में तत्व वही एक परमात्मा है। जिस प्रकार एक समस्त संख्या में है और एक का अनंत रूप सांख्य शास्त्र है इसी प्रकार परमात्मा शरीर और आत्म या स्त्री और पुरुष के अनंत उपस्थिति में एकरूप है। जब एक बंधन अपनी मुक्तता अर्थात आत्मा अपने परमात्मा को शरीर में खोजता है तब वह उसके आत्मा अर्थात बंधन रूप में स्थित हो जाते है अर्थात स्वयं परमात्मा रूपी मुक्तता उसके बंधन में मौजूद होते हैं । जब मुक्तता अपने बंधन अर्थात परमात्मा अपने शरीर को आत्मा में खोजता है तब वह उसके शरीर अर्थात मुक्त रूप में स्थित हो जाते हैं अर्थात आत्मा रूपी बंधन उसके शरीर में मुक्तता बन मौजूद होते हैं। सार में देखूं तो परमात्मा वह आयाम है जो पूरक है। यदि मैं खाना बनाना जानता हूँ तो वह अन्न बन जाते हैं , यदि मैं लिखना जानता हूँ तो वह पढ़ने वाले हो जाते हैं, यदि मैं कहना चाहता हूँ तो वह सुनने वाले हो जाते हैं, यदि मैं कलम हो जाता हूँ तो वह कागज़ बन जाते हैं। जब मुझमे सिर्फ मैं होता हूँ तो वो बाहर होते हैं और मुझे मेरे मैं से मुक्त करते हैं। जब मैं मुझमे नहीं होता अर्थात बाहर होता हूँ तो वो मेरे अंतर में आकर बस जाते हैं और मेरी मुक्तता से मुझे मुक्त कर बांधते हैं। मेरा अस्तित्व न मुक्तता में है न बंधन में , जब जैसी आवश्यकता मेरे अस्तित्व को होती है वह वहीँ बन मेरा जीवन बन आते हैं। हे प्रभो मैं कृतार्थ हुआ , आप ही आप सर्व्याप्त हो। आज मैंने जाना कि शरीर से शरीर अर्थात समस्त भव बंधन में आप ही हो और आत्म में आत्म अर्थात भाव मुक्तता आप ही हो। मैं शरीर से मुक्त होना और आत्म से किसी से बंधा हुआ जी रहा था, अब जाना की शरीर से समस्त भव बंधन को आपका स्वरुप समझ जीने और आत्म से आपको भाव मुक्त रूप में प्राप्त होने में ही मेरा अर्थात आपके समस्त जीवन प्रयाश की सद्गति है। आज मैंने जाना की मेरा शरीर आपका साधना रूपी साधन है जिसे समस्त में जीवन रूप भाव अर्थात आपकी उपस्थिति की सेवा में मुझे लगाना है और मेरी आत्मा आपका साधन रूपी साधना है जिसे समस्त के जीवन रूप भव की सेवा में उपस्थित रहना है। हे भव रूप हे भाव रूप आपको मेरा सादर प्रणाम। हरी ॐ नमः शिवाय
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